मूल विचार
जलरंग स्पर्श का निशान नहीं छिपाता। एक रंग दूसरे में उतरता है और उनका मिलन वह भाव रचता है जो अकेले किसी रंग में नहीं था।
दोनों नर्तक दूरी और प्रत्युत्तर से इस विचार को देह देते हैं। एक गति शुरू करता है; दूसरा उसे ग्रहण करता, नई दिशा देता या स्क्रीन के पार बहने देता है।
लहरें बिना मिटाए बदलने का बिंब हैं। पिछला रंग अगली परत के नीचे दिखता रहता है, जैसे जीवन में अनुभव जमा रहते हैं।
प्रकाश-वृत्त लौटने और फिर पहचानने के क्षण बनाते हैं। दोनों अलग हों तब भी दृश्य-रेखाएँ उनके संबंध को याद रखती हैं।
इस रचना को खुली सीमाओं में सुंदरता मिलती है। शक्ति का अर्थ बंद होना नहीं; अर्थपूर्ण मिलन से पहचान और गहरी हो सकती है।