मूल विचार
‘अनंत दृष्टि’ अनगिनत इफ़ेक्ट जोड़ने के बारे में नहीं, हमारी अभ्यस्त नज़र की सीमाएँ ढीली करने के बारे में है। अक्षर वस्तु और क्यूब सह-कलाकार बन सकता है।
यह भ्रम दर्शक के साथ एक मौन समझौते पर टिका है। वस्तु का वास्तविक भार नहीं है, फिर भी नर्तक की टाइमिंग उसे कुछ क्षणों के लिए सच कर देती है।
रोज़मर्रा के संकेत अपनी तय भूमिका से बाहर आते हैं। टाइपोग्राफ़ी केवल सूचना और ज्यामिति केवल संरचना नहीं रहती; दोनों परफ़ॉर्मेंस की सामग्री बनते हैं।
वास्तविक देह की सीमाएँ ही वर्चुअल स्पेस को विश्वसनीय बनाती हैं। हाथ का सटीक बढ़ना, रुकना और उठाना स्क्रीन को अधिक मुक्त और वास्तविक दिखाता है।
अंततः रचना दर्शक से जिज्ञासु बने रहने को कहती है। आसान उत्तर टालकर किसी छवि की नई संभावना देखने पर ही दृष्टि सच में ‘अनंत’ होती है।