मूल विचार
‘कल्पना की सदी’ से हम भविष्य को तैयार खड़ी दुनिया के बजाय ऐसी चीज़ के रूप में देखने का निमंत्रण देते हैं जिसे हम कोशिशों और एक-दूसरे की प्रेरणा से बनाते हैं। पहली चमक जिज्ञासा है; आकार लेता प्रकाश विचार के सच होने का संकेत; विस्तृत रंगीन स्थान भविष्य की आशा है। तकनीक कल्पना को दिखाई देने लायक बनाती है, लेकिन उसे आगे ले जाने वाली शक्ति मनुष्य की संवेदना, कर्म और रचनात्मकता है।
‘कल्पना की सदी’ मनुष्य और प्रकाश के मिलन से सृजन को समझने की कोशिश करती है। अँधेरे में चमक, इकट्ठे होते कण और हवा में तैरते गोले उन विचारों जैसे हैं जो अभी पूरी तरह बने नहीं हैं। हाथ बढ़ाकर, घूमकर, शरीर फैलाकर और मुद्रा थामकर नर्तक दृश्यों का जवाब देते हैं। हर हरकत खाली स्थान को रास्ते, रूपरेखाएँ और जीवन का एहसास देती है। आकर्षण सिर्फ स्क्रीन पर दिखती चीज़ों में नहीं, किसी विचार को जागते देखने के अनुभव में है।
अधिक ऊर्जावान हिस्सों में शरीर को घेरे किरणें, घूमते गोले और बड़े डिजिटल मानव-आकार कलाकारों की प्रतिध्वनि बनते हैं। वास्तविक शरीर की सीमाएँ हैं; दृश्य फैल सकता है, बिखर सकता है, जुड़ सकता है और मानव आकार से आगे बढ़ सकता है। यह साथ अनजान की खोज का तनाव रचता है। मनुष्य तकनीक को चुपचाप देखता नहीं—उसके करीब जाता है, उसे समझता है और दिशा देता है। उसकी भागीदारी तकनीक में मानवीय गर्मजोशी लाती है।
हल्के हिस्सों में सफेद पोशाकें और शरीर की कोमल रेखाएँ नीले-सफेद प्रकाश से मिलती हैं। प्रकाश-वृत्त, बिखरी चमक और तैरती आकृतियाँ मंच को शक्ति के विस्फोट से सूक्ष्म संवेदना की ओर ले जाती हैं। सृजन हमेशा कोई बड़ी क्रांति नहीं होता; वह एक नज़र, संकोची कोशिश या अनकहे विचार से भी शुरू हो सकता है। ताकत और कोमलता का यह क्रम अनजान भविष्य में भी मानवीय भावना और कल्पना को बनाए रखता है।
डिजिटल रूपरेखाएँ, चमकते शब्द और रंगीन प्रकाश-पट्टियाँ अमूर्त विचारों को संवाद और जुड़ाव में बदलती हैं। अधिक नर्तकों के शामिल होते ही दृश्य का केंद्र अलग-अलग शरीरों के बीच घूमता, जवाब देता और फैलता है। हर हरकत की अपनी शुरुआत होती है, लेकिन साझा लय उन्हें जोड़ती है। एक व्यक्ति की प्रेरणा से कई लोगों के सहयोग तक, मंच मिलकर रचने की संभावना दिखाता है।